आजतक चैनल और मंत्री दिनेश त्रिवेदी का असभ्य प्रदर्शन

आजतक चैनल ने टीवी पत्रकारिता के सभी मानक तोड़ दिए हैं। इस चैनल के समाचार संपादक से लेकर मालिकों तक और संवाददाताओं से लेकर विज्ञापनदाताओं तक यह संदेश गंभीरता से जाना चाहिए कि यह चैनल हिन्दी टीवी पत्रकारिता का सबसे असभ्य चैनल है। समाचार में गालियां देना,खबर में संवाददाता या समाचार संपादक का निजी नजरिया व्यक्त करना । तर्कहीन और विवेकहीन ढ़ंग से टीवी रिपोर्ट पेश करना रोजमर्रा की बात हो गयी है।

आजतक की समाचार प्रस्तुतियों की विशेषता है मानवाधिकार हनन करना। विभिन्न सामाजिक समूहों,पेशेवर समूहों,व्यक्तियों, औरतों,बच्चों,धार्मिक समूहों आदि पर केन्द्रित खबरें ,समाचार मूल्य के बुनियादी मानकों को ताकपर और मानवाधिकार हनन के परिप्रेक्ष्य में पेश की जा रही हैं। यह चैनल अपनी प्रस्तुतियों से साधारण जनता और विभिन्न सामाजिक समूहों और पेशे के लोगों के मानवाधिकारों का हनन करने में लगा है। इस चैनल का मूल लक्ष्य है विज्ञापन से ज्यादा से ज्यादा धन कमाना और घटिया पत्रकारिता करना ।

यह सच है कि आजतक को हिन्दी खबरिया चैनलों में खूब देखा जाता है,इससे भी बड़ा सच है कि इस चैनल की टीवी पत्रकारिता में कोई साख नहीं है। पेशेवर फूहड़ता इसकी प्रस्तुतियों में भरी पड़ी है। आप किसी भी दिन के कार्यक्रम देखें आपको गहरी निराशा हाथ लगेगी।

आजतक की गैर-पेशेवर और मानवाधिकार हनन की तस्वीर पेश करने के लिए एक ही खबर को उदाहरण के रूप में रखना चाहता हूँ। कल की खबरों में दिल्ली और राजस्थान के डाक्टरों की हड़ताल पर केन्द्रित खबर थी। यह खबर कोई भी हिन्दीवाला देख ले तो उसका सिर शर्म से झुक जाएगा। एंकर थे हिन्दी टीवी के तथाकथित जानेमाने पत्रकार,मुझे दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि इस तरह की असभ्य पत्रकारिता और इतनी गंदी भाषा मैंने अंग्रेजी और बांग्ला समाचार चैनलों में नहीं सुनी।

आजतक के एंकर,संवाददाता और समाचार संपादक को लगता है गंदी भाषा बोलने का खास प्रशिक्षण दिया जाता है। अपमानजनक भाषा बोलना आजतक चैनल का प्रधानधर्म है। मैं हिन्दी साहित्य पढ़ाता हूँ और विगत 20-22 सालों से मीडिया भी पढ़ाता हूँ,मेरी दर्जनों किताबें हैं,प्रतिदिन कई घंटे टीवी भी देखता हूँ लेकिन भाषायी असभ्यता का इन दिनों जैसा नंगा नाच आजतक चैनल पर हो रहा है उससे हिन्दी मीडिया की गरिमा को ठेस लगी है। हम चाहते हैं कि आजतक चैनल मानवाधिकार विरोधी,अशालीन और गैर-पेशेवर भाषा का समाचार प्रस्तुतियों में प्रयोग तुरंत बंद करे।

भाषायी असभ्यता देखिए- कल दिल्ली और राजस्थान के डाक्टरों की हड़ताल पर जो कवरेज था ,रात 10 बजे प्राइम टाइम में , उसमें डाक्टरों के बारे में जो कहा गया वह दण्डनीय अपराध है। टीवी के ‘महान एंकर’ ने कहा ‘ ये डाक्टर नहीं कंस हैं’। एक रिपोर्टर ने राजस्थान से जो समाचार भेजा उसमें डाक्टरों के लिए कहा गया ‘जल्लाद ’।

हम आजतक वालों से पूछना चाहेंगे वे किस स्कूल से मीडिया की शिक्षा लेकर आए हैं? क्या थोड़ा भी ज्ञान नहीं है कि इस तरह की भाषा न बोली जाए। अपमानजनक भाषा, सम्मान को ठेस पहुँचाने वाली भाषा,इज्जत उतारने वाली भाषा, गैर पेशेवर भाषा का प्रयोग टीवी हिंसाचार की कोटि में आता है। इस भाषा का आजतक में निरंतर प्रयोग बढ़ रहा है।

दूसरी बात यह कि वाचिक हिंसा ,कायिक हिंसा से भी ज्यादा खतरनाक और घातक होती है। उससे व्यक्ति,समुदाय या वर्गविशेष को गहरी चोट लगती है। व्यक्ति, समुदाय, पेशे समुदाय, वर्गविशेष आदि को आघात लगता है। और इस तरह की भाषा का प्रयोग मानवाधिकार हनन की कोटि में आता है। भारत के कानूनों के अनुसार दण्डनीय अपराध है। अरे भाई आप खबरें दें गालियां क्यों देते हैं,अपमानजनक भाषा क्यों बोलते हैं ।

आजतक वालों को यह समझना चाहिए कि उनके पास शक्तिशाली मीडिया है जिसका वे दुरूपयोग कर रहे हैं। वे खबरें कम ,अपमानजनक खबरें ज्यादा प्रचारित कर रहे हैं। मसलन डाक्टरों की हड़ताल को ही लें। टीवी या मीडिया या आम नागरिक को डाक्टरों की हड़ताल को डाक्टरों के नजरिए से देखना चाहिए। डाक्टरों पर आए दिन हमले हो रहे हैं,डाक्टरी पेशे में जो लोग हैं वे बेइंतिहा मेहनत करके समाज की सेवा करते हैं। खासकर अस्पतालों में काम करने वाले डाक्टरों की सेवाएं अतुलनीय हैं। इसकी तुलना में उनके पास कम से कम संसाधन हैं और अस्पताल में उनकी सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है।

यदि किसी मरीज को कोई खास शिकायत हुई, या वह मर गया तो मरीज के नाते-रिश्तेदार-दोस्त सीधे गाली-गलौज, मारपीट और तोड़फोड़ पर उतर आते हैं। डाक्टरों के साथ इस तरह के व्यवहार की किसी भी कीमत पर हिमायत नहीं की जा सकती। दिल्ली और राजस्थान में हुई डाक्टर हड़ताल के संदर्भ में यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि डाक्टरों के द्वारा बार-बार शिकायत किए जाने बाबजूद अस्पतालों में सुरक्षा नहीं बढ़ाई गयी है। दोषियों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं हुआ है।

डाक्टरों को पेशेवर और नागरिक होने के नाते भारत के संविधान के तहत हड़ताल का अधिकार है। किसी भी व्यक्ति,संस्था ,मीडिया और सरकार को हड़ताल का हक छीनने की अनुमति नहीं दी जा सकती। डाक्टरों के बारे में उनकी समस्याओं के बारे में मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में सोचने और खबर देने की जरूरत है।

उल्लेखनीय है एनडीटीवी पर स्वास्थ्य राज्य मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने कहा कि हड़ताली डाक्टरों को एमसीआई को ‘डि-रजिस्टर्ड’ कर देना चाहिए।

अरे मंत्री साहब समस्या तो आपके निकम्मेपन और सरकार द्वारा सुरक्षा व्यवस्था और संसाधन मुहैय्या न कराने से पैदा हुई है। आपने अभी तक दिल्ली के डाक्टरों और अस्पतालों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान क्यों नहीं की ? कायदे से तो इस निकम्मेपन के लिए मंत्री को बर्खास्त कर देना चाहिए। जिसके निकम्मेपन के कारण डाक्टरों को मजबूरी में हड़ताल का सहारा लेना पड़ा।

इन दिनों आधिकांश हिन्दी चैनलों में मानवाधिकार हनन का परिप्रेक्ष्य हावी है। मानवाधिकार हनन की हिमायत में प्रस्तुत खबरें मीडिया की समाजसेवा के दायरे में नहीं आतीं बल्कि कारपोरेट सेवा के दायरे में आती हैं। यह अब आजतक चैनल को तय करना है कि उसे समाजसेवा करनी है या कारपोरेट सेवा करनी है।

कारपोरेट सेवा,मानवाधिकार अपहरण और गैर-पेशवर प्रस्तुतियों के बीच अन्योन्याश्रित संबंध है। इन दिनों इस संबंध को हिन्दी के अधिकांश चैनल निभा रहे हैं।

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