अमरीकी रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तानी शासन तंत्र लश्कर का असली आका

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खुद को  आतंकवाद को बड़ा शिकार बताकर दुनिया के सामने गाहे-ब-गाहे छाती पीटने वाला पाकिस्तान एक बार फिर बेनकाब हुआ है। आतंकी गुट लश्कर को लेकर कई वर्ष तक चले एक अध्ययन की रिपोर्ट में इस पाकिस्तानी दावे को एकदम अमान्य करार दिया गया है कि पाकिस्तान का भारत में विघटनकारी गतिविधियों में कोई हाथ नहीं है। अध्ययन टेररिज्म कंबैट सेंटर एट वैस्ट प्वांइट नामक अमरीकी संस्थान ने कराया है। बीते कुछ सालांे के दौरान मारे गए नौ सौ से अधिक लश्कर-ए-तैयबा के गुर्गों  पर हुए शोध के अनुसार इनमें से अधिकांश कश्मीरी न होकर पाकिस्तान के पंजाबी हैं।
शोधकर्ताओं ने लश्कर को लेकर कुछ आधारभूत सवालों के जवाब खोजने चाहे। मसलन, लश्कर के मिशन पर मारे गए युवकों की भर्ती कैसे और कहां से हुई? उनकी  सामाजिक पृष्ठभूमि कैसी थी ? उनका  प्रशिक्षण कितना और  कहां हुआ और ये लोग आखिर मौत के इस खेल में शामिल क्यूं हुए ? मामले की तह में जाने की प्रक्रिया  में  यह बात उभर कर सामने आई कि आमतौर पर पाकिस्तान के जिन जिलों से वहां की फौज से अधिक जवान या अफसर आते हैं, वहीं से यह जेहादी भी भर्ती हुए। इनमें से कइयों के परिवार के लोग पूर्व में पाकिस्तानी फौज में काम कर चुके थे। इससे यह एक बार फिर शीशे की तरह साफ हो गया कि लश्कर और पाकिस्तानी फौज का संबंध बहुत गहरा है और कहीं न कहीं यह भी सही है कि लश्कर पाकिस्तान के सरकारी तंत्र,जिसे की फौज ही नियंत्रित करती है,का ही एक खिलौना है। वह खिलौना,जिसके झंडे-बैनर तले पाकिस्तान भारत की धरती पर और खासकर जम्मू कश्मीर में रह रह कर खून की होली खेलता रहा है।
ध्यान रहे कि मुंबई हमले का सवाल जब जब भारत की ओर से उठाया जाता है, तब तब पाकिस्तान यह कह कर बच निकलने की कोशिश करता है कि पाकिस्तान सरकार और सेना के हाथ इस प्रकरण में एकदम साफ हैं। पाकिस्तान के जो पूर्व सेनाधिकारी या राजनयिक टेलीविजन पर चर्चाओं में भाग लेने पंहुचते हैं, मुंबई हमले के मामले में सवालों से घिरने पर भागने के लिए यही दलील देते हैं कि भारत को स्टेट और नॉन-स्टेट एक्टर्स में फर्क करना चाहिए। पाकिस्तान के अपने दोस्त अर्थात अमरीका की एजेंसी के इस ताजातरीन अध्ययन में यह बात बहुत साफ होकर उभरी है कि लश्कर और पाकिस्तान के शासन-तंत्र का चोली-दामन का साथ है। उन्हें किसी भी सूरत में अलग करके नहीं देखा जा सकता।
रिपोर्ट दर्शाती है कि अधिकांश लश्करी जेहादी कश्मीर में मारे गए। यह तथ्य पाकिस्तान के एक अन्य मिथ्या प्रलाप को तार तार करता है। पाकिस्तान कश्मीर में आतंकी घटनाओं को स्थानीय यानि कश्मीरी लोगों की कथित आजादी की लड़ाई करार देता रहा है। उसके कुटिल कूटनयिकों को अक्सर यह झूठ दोहराते हुए सुना जाता है कि घाटी में हिंसा के सौदागर सशस्त्र आतंकी ज्यादातर कश्मीर के नौजवान ही हैं। अब कश्मीर में हमारे सुरक्षा बलों के हाथों जन्नतनशीन हो चुके लश्करी जेहादियों को लेकर अमरीकी शोध रपट पढ़ने के बाद भी वे अपनी तोतारटंत छोड़ेंगे या नहीं कहना कठिन है।
यहां यह उल्लेखनीय है कि जिन मारे गए जेहादियों के जीवन का अध्ययन इस रिपोर्ट में हुआ है,उनमें से नवासी फीसदी पाकिस्तानी पंजाब के हैं। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के नागरिकों की इसमें शिरकत महज एक फीसदी है।
रिपोर्ट में यह रोचक तथ्य भी अंकित है कि जेहादियों की खुलेआम भर्तियां करने वाला लश्कर पूरे पाकिस्तान में उसके कार्यालयों और प्रकाशनों के माध्यम से असरदार मौजूदगी दर्शाता है। ऐसा होना पाकिस्तानी शासन-तंत्र की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मदद और सहमति के बिना संभव ही नहीं है।
अमरीकी रिपोर्ट के मुताबिक लश्कर दौरा-ए-आम और दौरा-ए-खास नाम से दो प्रकार के प्रशिक्षण शिविर चलाता है। पहले की अवधि तीन सप्ताह की है। जाहिर है कि इसमें धार्मिक शिक्षा के नाम पर प्रशिक्षुओं को धार्मिक उन्माद की घुट्टी पिलाई जाती होगी। इसी में कुछ स्वचालित हथियारों को चलाने के अलावा हथगोले इत्यादि के उपयोग की जानकारी दी जाती है। मगर दौरा-ए-खास का प्रशिक्षण हर किसी को नहीं मिलता। जिन्हें लश्कर ने कश्मीर या भारत के दूसरे हिस्सों में आतंकी मिशन पर भेजना होता है, वही चुनींदा लोग इस कोर्स तक पंहुचते हैं। इन्हें अत्याधुनिक हथियारांे से लेकर जासूसी तक का प्रशिक्षण मिलता है। रिपोर्ट बताती है कि अध्ययनाधीन आतंकियों में से सबसे ज्यादा संख्या उन की है जिन्हें पाक अधिकृत कश्मीर के मुजफ्फराबाद में प्रशिक्षण मिला। इसके बाद लश्कर का दूसरा बड़ा प्रशिक्षण ठिकाना अफगानिस्तान में बताया जाता है।
ताजा अमरीकी रिपोर्ट आतंक के बारे में कुछ प्रचलित धारणाओं को मिथक साबित करती है। मसलन, अक्सर यह कहा और माना जाता है कि कम पढ़े लिखे अथवा महज मदरसों में पढ़े युवक ही आतंक के भ्रमजाल में फंसते हैं। मगर रिपोर्ट में समाहित आंकड़े कुछ ओर कहते हैं। अधिकांश आतंकी औसत पाकिस्तानी से कहीं अधिक पढे़ लिखे पाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार यदि इस अध्ययन में शामिल हुए मारे गए आतंकियों के बारे में पाकिस्तान के भीतर प्रकाशित सामग्री लश्कर की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करती है तो यह कहना गलत नहीं होगा कि पाकिस्तान के कुछ श्रेष्ठ शिक्षा प्राप्त नौजवानों को भारत के साथ जारी संघर्ष में मरने के लिए रवाना किया जा रहा है।
अमरीकी शोध रिपोर्ट में जहां अमरीकी चिंताओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है, यह रिपोर्ट भारत के नीति-नियंताओं और आतंकरोधी-तंत्र के लिए भी खासी उपयोगी साबित हो सकती है। लश्कर के चाल-चरित्र-चेहरे को समझने के इस अमरीकी प्रयास पर निस्संदेह हमारे विशेषज्ञों की निगाह जाएगी। मगर आतंक से निपटने का काम केवल नीति-नियंताओं और सुरक्षा बलों का ही नहीं है। भारतीय समाज के भीतर भी इन तत्वों के बारे में समझ विकसित होना आवश्यक है। भारत को खंड-खंड करने के लिए हजारों साल तक मरने-मिटने की बात करने वाले पाकिस्तानी जेहादियों को किसी भी मायने में कम करके नहीं आंका जा सकता। इसी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि तीन लाख के लगभग पाकिस्तानी और विदेशी लोग लश्कर के शिविरों में एक या दूसरे किस्म का प्रशिक्षण पा चुके हैं।  अभिप्राय यह कि आतंक का यह कारखाना बड़ी तेज गति से पैदावार कर रहा है। जम्मू कश्मीर में यह हमारी सेना द्वारा की जा रही कड़ी चौकसी का ही नतीजा है कि इस कारखाने में तैयार आत्मघाती जीव या तो सरहद पार ही नहीं कर पाते और यदि कर जाते हैं तो अक्सर समय रहते उनके असली अंजाम तक पंहुचा दिए जाते हैं। कहना न होगा कि रिपोर्ट में जिन जेहादियों के बारे में हुए अध्ययन का खुलासा है उनमें से करीब 95 फीसदी जम्मू कश्मीर में ही मारे गए हैं। यहां समझने की बात यह है कि लश्कर के लिए कश्मीर खूनी खेल का पसंदीदा दंगल है। कश्मीर में घुसपैठ में जब वह कामयाब नहीं होते तो उनका ध्यान अफगानिस्तान की तरफ चला जाता है, एक वैकल्पिक मैदान-ए-जंग के नाते। अब जबकि अमरीका अफगानिस्तान से रवानगी के लिए सामान बांधने लगा है तो पाकिस्तानी तालिबान  हो या लश्कर, ऐसे तमाम लहू के सौदागरों के लिए खूबसूरत कश्मीर घाटी नए सिरे से पसंदीदा मंजिल के रूप में उभरेगी। अमरीकी रिपोर्ट में भी इस ओर इंगित किया गया है कि अगले वर्ष अमरीका जब अफगानिस्तान से हटेगा तो पाकिस्तानी शासनतंत्र लश्कर के अमले को कश्मीर पर और अधिक ध्यान कें्िरदत करने का फरमान दे सकता है। इस सूरतेहाल में जम्मू कश्मीर में आंतरिक व बाहरी सुरक्षा को कायदे से चाक-चौबंद करने की आवश्यकता है। ऐसे में सरहद पर ही नहीं समूची कश्मीर घाटी में सेना की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी। लिहाजा, रिपोर्ट को पढ़ने के बाद अफस्पा हटाने की रट लगाने वाले कश्मीरी राजनेताओं को भी अपने रवैये पर पुनर्विचार करना चाहिए।
-लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व कश्मीर मामलों के  अध्येता हैं।

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